तोहरे बालकवा के जाड़ लागता। दलित बस्ती में गांती बांधे बच्चों की टोली। उघार टांग। नंगे पांव। ठिठुरे होठ। तन पर कोई गर्म कपड़ा नहीं। हल्के-फुल्के सामान्य कपड़े। बस ऊपर से बंाधे हैं रक्षा कवच के रूप में गमछा । फिर भी जुबान पर भगवान का नाम।
मासूम निश्छल ये बच्चे। बस इतना ही जानते हैं कि रामजी धाम करेंगे। हम बच्चों की कंपकंपी जाएगी। इन्हें रामजी का ही भरोसा है, क्योंकि समाज का कोई भी पहरुआ इनकी सुध लेने नहीं आता। बस इंतजार और विश्वास के बूते जी लेने का दम। भाई वाह..।
हमारे गाँव के पास के दलित बस्ती की एक झलक : पौ फटने को है,मतलब सूर्य भगवान् निकलने को हैं .... बच्चे पूर्व दिशा की ओर अपलक निहार रहे थे। अनुनय-विनय में लगे थे ताकि भगवान सूर्य आंख खोलेंगे। बालक सलाम कर रहे हैं। ठंड से छुटकारा पाने का बच्चों का मनमोहक व बड़ा नायाब तरीका। पर पता नहीं कब सुनेंगे रामजी। कब बालकों को सुकून मिलेगा।
खैर यह तो प्रकृति की परंपरा है। पर नीति नियंता कहां हैं? उनकी नजरें पता नहीं कब इनकी ओर फिरेगी। यह भी तो शायद रामजी ही जानें।उसी रात की बात। पूस की भयानक सर्द रैन। सायं-सायं करती पछुआ हवा की चपेट में मलिन बस्तियों की झोपड़ियां व तंबू। धूप अंधेरे में सनी हुई बस्ती का सन्नाटा।
सन्नाटों को चीर रही थी हुंआ-हुंआ करती सियारों की टोली। रात को आठ बजे ही लग रहा था 12 बजने को थे। हिम्मत कर के पहुंचा था वहां। डर था। कहीं कोई चोर-चोर न चिल्ला पड़े। रामजी को गोहरा रहा था। रामजी सफल करे। गरीब बेहाल। ये गुदड़ी के लाल। पछुआ हवा की सनसनी कुछ के सीने के अंदर तक पहुंच रही थी।
कुछ बूढ़े व बच्चों की खांसी दम लेने का नाम ही नहीं ले रही थी। पल भर को कभी खांसी दम लेती तो एक बूढ़े के मुंह से भजन गाने की आवाज सुनाई पड़ने लगती। 'जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए। सीता राम, सीता राम, सीता राम कहिए। विधि के विधान जान हानि लाभ सहिए। सीता राम, सीता राम, सीता राम कहिए।'
Saturday, January 9, 2010
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